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Nalanda University : 1600 सालों के बाद फिर से खुला नालंदा यूनिवर्सिटी

Education News 19 Jun 2024 Updated: 09 Jul 2024 928 Views 1 min read
Nalanda University : 1600 सालों के बाद फिर से  खुला नालंदा यूनिवर्सिटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नालंदा यूनिवर्सिटी के नए कैंपस का उद्घाटन कर दिया है . उनके साथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेनकर के साथ ही 17 देशों के राजदूत और नालंदा विश्विद्यालय के छात्र भी मौजूद रहे.

नालंदा यूनिवर्सिटी में दो अकेडमिक ब्लॉक हैं, जिनमें 40 क्लासरूम हैं. यहां पर कुल 1900 बच्चों के बैठने की व्यवस्था है.यहां पर कुल 1900 बच्चों के बैठने की व्यवस्था है. यूनिवर्सिटी में दो ऑडिटोरयम भी हैं जिसमें 300 सीटे हैं

भारत की सबसे प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में करीब 10 हजार छात्र और 1500 अध्यापक पठन-पाठन का कार्य करते थे। इस विश्वविद्यालय का निर्माण 5वी शताब्दी में हुआ था जिसे आक्रमणकारियों ने 12वीं शताब्दी में जला दिया था। लम्बे समय के बाद इस यूनिवर्सिटी का फिर से बनाया गया है 

राष्ट्रपति डॉ कलाम ने रखा था पुनर्स्थापना का प्रस्ताव

नालंदा विश्वविद्यालय के पुनरुद्धार को 2006 में गति मिली जब भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने बिहार राज्य विधान सभा के एक सत्र के दौरान इसकी पुनर्स्थापना का प्रस्ताव रखा।

नालंदा यूनिवर्सिटी का इतिहास (Nalanda University History)

नालंदा यूनिवर्सिटी की स्थापना पांचवी सदी में हुई थी। दुनिया भर के छात्रों के लिए यह विश्विवद्यालयआकर्षण का केंद्र था इसमें करीब 10000 छात्र पढ़ते थे जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे। इतिहासकारों के अनुसार इसकी नींव गुप्त राजवंश के कुमार प्रथम ने रखी थी जिसे 12वीं शताब्दी में अकर्मणकारी खिजली ने इसको नष्ट कर दिया था। इस विश्वविद्यालय ने इतिहास में एक अमिट छाप देश दुनिया में छोड़ा है। 

बात करे इसमें पढ़ने वाले छात्रों में अधिकांश छात्र एशिया महाद्वीप के चीन कोरिया और जापान देशों से आते थे। इतिहासकारों के मुताबिक भिक्षु हैंग सेंग नेवी सातवीं सदी में नालंदा में शिक्षा ग्रहण की थी उन्होंने अपने किताबों में नालंदा विश्वविद्यालय की सभ्यता का जिक्र किया है यह बौद्ध धर्म के 2 सबसे अहम केंद्रों में से एक था। ज्ञान और बुद्धिमत्ता की प्रचार की दिशा में प्राचीन भारत के योगदान का गवाह है। 

ह्वेन त्सांग ने किया प्रचार

630 ईस्वी में भारत आए त्सांग 645 ईस्वी में चीन लौटे. वे अपने साथ नालंदा से 657 बौद्ध धर्मग्रंथों के लेकर गए थे. ह्वेन सांग को दुनिया के सबसे प्रभावशाली बौद्ध विद्वानों में से एक माना जाता है. इन ग्रंथों में से बहुतों का उन्होंने चीनी भाषा में अनुवाद किया.

बख्तियार खिलजी ने आक्रमण कर लगा दी थी आग

इतिहास के जानकार बताते हैं कि साल 1193 में बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय पर आक्रमण किया और यहां पर आग लगवा दी थी. तब नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में रखी किताबें ही कई सप्ताह तक जलती रहीं और आग नहीं बुझ पाई थी. इस आक्रमण के दौरान नालंदा में काम करने वाले कई धर्माचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं को भी मार डाला गया था.

 

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